फहमीदा रियाज़ की बेबाकी ही उन्हें निर्वासन तक ले गयी

Fahmida Riaz – फहमीदा की बेबाकी ही उन्हें निर्वासन तक ले गई

पाकिस्तान की मशहूर शायरा और मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़हमीदा रियाज़ का लंबी बीमारी के बाद लाहौर में निधन हो गया है। 28 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बरेली के रहने वाले साहित्यिक परिवार में जन्मी फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तान की बेहद चर्चित कवयित्री थीं।

पाकिस्तान की मशहूर शायरा और मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़हमीदा रियाज़ का लंबी बीमारी के बाद लाहौर में निधन हो गया है।

फहमीदा पाकिस्तान की बेबाक शायरा थीं लेकिन उनको अपने क्रांतिकारी बोलों की वजह से पाकिस्तान की सैनिक हुकूमत का दंश झेलना पड़ा था, क्योंकि प्रगतिशील विचारधारा को पाकिस्तान में कभी पनपने नहीं दिया गया।

कट्टरपंथी ताकतों और सैनिक शासन का वहां हमेशा से आधिपत्य रहा है। नतीजा यह रहा कि 80 के दौर में अपने प्रगतिशील विचारों के चलते, ‘चादर और चहारदीवारी’ लिखने के बाद जनरल जिया-उल-हक़ के शासन में उन पर राज द्रोह के मुकदमे हुए और निर्वासन झेलना पड़ा, तब वे भारत आईं।

दिल्ली! तिरी छाँव बड़ी क़हरी
मिरी पूरी काया पिघल रही
मुझे गले लगा कर गली गली
धीरे से कहे” तू कौन है री?”

जितने साफगोई से वहां के हालात पर वे लिखती-बोलती रहीं, वह पाकिस्तानी हुकूमत को रास नहीं आता था। जनरल जिया के रहते वे भारत में ही रहीं और बेनजीर भुट्टो के शासनकाल में जब वे निर्वासन से लौटीं तो उनके वतन में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

कुछ समय तक वे जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में आवासीय लेखिका भी रहीं। फहमीदा चाहे भारत में हों या पकिस्तान में, उनकी रचनाओं में धार वही रही। बहुतों ने पसंद किया तो बहुतों को वे अब भी खटकती हैं,

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